Lord Jagannath:- एक ऐसा रहस्यमय मंदिर, जिसके रहस्य आजतक है अनसुलझे। जहां भगवान गर्भगृह से निकल कर आते है ,भक्तो को दर्शन देने। आइए जानते है इस मंदिर के रोचक तथ्य।

पुराणों में इसे धरती का वैकुंठ कहा गया है।
द्वापर के बाद भगवान कृष्ण पुरी में निवास करने लगे और बन गए जग के नाथ अर्थात जगन्नाथ ( lord jagannath)। पुरी का जगन्नाथ धाम चार धामों में से एक है।भगवान विष्णु जब चारों धामों पर बसे अपने धामों की यात्रा पर जाते हैं तो हिमालय की ऊंची चोटियों पर बने अपने धाम बद्रीनाथ में स्नान करते हैं। पश्चिम में गुजरात के द्वारिका में वस्त्र पहनते हैं। पुरी में भोजन करते हैं और दक्षिण में रामेश्‍वरम में विश्राम करते हैं। माना जाता है कि यहां श्रीकृष्ण का हृदय रखा हुआ है जो आज भी धड़कता है जिसे जगन्नाथ पुरी मे बृहम पदार्थ कहते है ।

मंदिर की स्थिति :-

हिन्दुओं की प्राचीन और पवित्र 7 नगरियों में पुरी उड़ीसा राज्य के समुद्री तट पर बसा है। जगन्नाथ मंदिर विष्णु के 8वें अवतार श्रीकृष्ण को समर्पित है। भारत के पूर्व में बंगाल की खाड़ी के पूर्वी छोर पर बसी पवित्र नगरी पुरी उड़ीसा की राजधानी भुवनेश्वर से थोड़ी दूरी पर है। आज का उड़ीसा प्राचीनकाल में उत्कल प्रदेश के नाम से जाना जाता था। 

मंदिर का इतिहास :

सबसे पहला प्रमाण मंदिर के इतिहास में महाभारत के वनपर्व में मिलता है, जिसमें सबर आदिवासी विश्‍ववसु ने नीलमाधव के रूप में इसकी पूजा की थी। आज भी पुरी के मंदिरों में कई सेवक हैं, जिन्हें दैतापति के नाम से जाना जाता है।

नीलमाधव रूप:-

पौराणिक मतानुसार जब भगवान श्रीकृष्ण अपनी लीला समाप्त कर देह को त्याग कर गौलोक पधारे तब अर्जुन ने उनके देह का अंतिम संस्कार किया था। कहा जाता है की श्रीकृष्ण का संपूर्ण शरीर तो पंचतत्व मे विलिन हो गया किन्तु उनका हृदय धडकता रहा तब अर्जुन ने इस हृदय को समुद्र मे प्रवाहित कर दिया जो नीलांचल स्थित सबर कबीले के लोगो को मिला । तब से यह सबर जनजाति के कुल देवता बन गये।जिन्हे नीलमाधव कहा जाने लगा ।सबर जनजाति के देवता होने के कारण यहां भगवान जगन्नाथ का रूप कबीलाई देवताओं की तरह है। 

नीलमाधव की खोज:-

राजा इंद्रदयुम्न मालवा के राजा थे, जिनके पिता का नाम भारत और माता का नाम सुमति था। राजा इंद्रदयुम्न धर्मनिष्ठ राजा थे उन्होंने कई विशाल यज्ञ किए और सरोवर बनवाए। एक रात, भगवान विष्णु ने उन्हें सपने में दर्शन दिया और कहा कि नीलांचल पर्वत की एक गुफा में उनकी मूर्ति है, जिसे नीलमाधव कहते हैं। उन्होंने अपने सेवकों को नीलांचल पर्वत की खोज में भेजा जिसमें एक ब्राह्मण विद्यापति भी था।


विद्यापति ने सुन रखा था कि सबर कबीले के लोगो के पास एक श्रीविग्रह है जिसे वह नीलमाधव के रूप मे पूजा करते हैं उनका मुखिया विश्ववसु नीलमाधव का बहुत बडा उपासक है और उन्होेंने अपने देवता के इस श्रीविग्रह को नीलांचल पर्वत की गुफा में छुपा रखा है। वह यह भी जानता था कि सबर कबीले के लोग उसे नीलमाधव का श्रीविग्रह ले जाने नही देगें । तब विद्यापति ने मुखिया की बेटी से विवाह कर लिया और आखिर में वह अपनी पत्नी के जरिए नीलमाधव की गुफा तक पहुंचने में सफल हो गया और उसने मूर्ति चुरा कर अपने राजा को लाकर दे दी।

Lord jagannath मंदिर निर्माण:-

विश्‍ववसु अपने आराध्य देव की मूर्ति चोरी होने से बहुत दुखी हुआ। अपने भक्त के दुख से भगवान भी दुखी हो गए और वापस नीला की गुफा में लौट गए, लेकिन साथ ही राजा इंद्रदयुम्न से वादा किया कि वो एक दिन उनके पास जरूर लौटेंगे बशर्ते कि वो एक दिन उनके लिए विशाल मंदिर बनवा दे। राजा ने मंदिर निर्माण कार्य पूर्ण कर दिया और भगवान विष्णु से मंदिर में विराजमान होने के लिए प्रार्थना की।

भगवान ने कहा कि मेरे नीलमाधव स्वरूप के दर्शन हर मनुष्य नही कर सकता इसलिए तुम मेरी मूर्ति बनाने के लिए समुद्र में तैर रहा पेड़ का बड़ा टुकड़ा उठाकर लाओ, जो द्वारिका से समुद्र में तैरकर पुरी आ रहा है। राजा के सेवकों ने उस पेड़ के टुकड़े को तो ढूंढ लिया लेकिन सब लोग मिलकर भी उस पेड़ को हीला तक नहीं पाए। तब राजा को समझ आ गया कि नीलमाधव के अनन्य भक्त सबर कबीले के मुखिया विश्‍ववसु यहा उपस्थित नही है । राजा ने सेवको को विश्ववसु को लेने भेजा । सब उस वक्त हैरान रह गए, जब विश्ववसु भारी-भरकम लकड़ी को उठाकर मंदिर तक अकेले ले आए।

Lord jagannath जी का श्रीविग्रह

राजा के कारीगरों ने लाख कोशिश कर ली लेकिन कोई भी लकड़ी में भगवान की मूर्ति गढ़ने के लिए एक छैनी तक नही लगा पाया। तब तीनों लोक के कुशल कारीगर भगवान विश्‍वकर्मा एक बूढ़े व्यक्ति का रूप धरकर आए और बोले के वे नीलमाधव की मूर्ति बना सकते हैं, लेकिन साथ ही उन्होंने अपनी शर्त भी रखी कि वे 21 दिनो तक मूर्ति बनाएंगे और अकेले में बनाएंगे। कोई उनको बनाते हुए नहीं देखेगा। राजा ने उनकी शर्त मान ली।

लोगों को आरी, छैनी, हथौड़ी की आवाजें आती रहीं। लेकिन जब कक्ष से आवाज आना बंद हो गई तब राजा इंद्रदयुम्न की रानी गुंडिचा को चिंता हुई और वह अपने आप को रोक नहीं पाई। वह दरवाजे के पास गई तो उसे कोई आवाज सुनाई नहीं दी। वह घबरा गई। उसे लगा बूढ़ा कारीगर मर गया है। उसने राजा को इसकी सूचना दी। अंदर से कोई आवाज सुनाई नहीं दे रही थी। सभी शर्तों और चेतावनियों को दरकिनार करते हुए राजा ने कमरे का दरवाजा खोलने का आदेश दिया।

जैसे ही कमरा खोला गया तो बूढ़ा व्यक्ति गायब था और उसमें 3 अधूरी ‍मूर्तियां मिली पड़ी मिलीं। भगवान नीलमाधव और उनके भाई के छोटे-छोटे हाथ बने थे, लेकिन उनकी टांगें नहीं, जबकि सुभद्रा के हाथ-पांव बनाए ही नहीं गए थे। ऐसे lord jagannath का श्रीविग्रह बना ।

राजा ने इसे भगवान की इच्छा मानकर इन्हीं अधूरी मूर्तियों को स्थापित कर दिया। तब से लेकर आज तक तीनों भाई बहन इसी रूप में विद्यमान हैं।

Lord jagannath रथ यात्रा:-

Lord jagannath

रथ यात्रा का पौराणिक मत है कि स्नान पूर्णिमा के दिन lord jagannath का जन्मदिन होता है जगन्नाथ पुरी के मंदिर में स्नान पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है, जिसके दौरान भगवान जगन्नाथ को उनके बड़े भाई बलराम और बहन सुभद्रा के साथ रत्न जडीत स्वर्ण सिंहासन से उतार कर 108 कलशों से उनका शाही स्नान होता है।मान्यता यह है कि इस स्नान से प्रभु बीमार हो जाते हैं उन्हें ज्वर आ जाता है।स्नान कियजाता है। इसके बाद, उन्हें रथों में बिठाकर तिहारा क्षेत्र में विशाल रथों पर यात्रा कराई जाती है।

Lord jagannath

इन 15 दिनों के दौरान, भगवान को ‘ओसर घर’ के एक विशेष कक्ष में रखा जाता है। इस अवधि में केवल मंदिर के प्रमुख सेवक और चिकित्सक ही भगवान महाप्रभु को देख सकते हैं। इसी बीच, मंदिर में भगवान महाप्रभु का प्रतिनिधित्व करने वाली मूर्ति को स्थापित किया जाता है, और उनकी पूजा-अर्चना की जाती है।


राजमार्ग पर आते समय, महाप्रभु श्री कृष्ण, बड़े भाई बलराम जी, और बहन सुभद्रा जी रथ पर विराजमान होते हैं और नगर भ्रमण के दौरान भक्तों को दर्शन देते हैं। इससे पहले, वे 15 दिन कक्ष में रहकर स्वस्थ होते हैं, जिसे नव यौवन नैत्र उत्सव के रूप में जाना जाता है। इस रथयात्रा मे भक्त रस्सी के माध्यम से इन विशाल रथो को अपने हाथों से खिचते है।

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