Indian mythology के अनुसार कितने लोगों को अजर-अमर माना गया है:-
Indian mythology, शास्त्रों और मिथकों में 08 लोगों को अजर-अमर माना गया है,
अश्वत्थामा बलिव्यासो हनूमांश्च विभीषण: ।
कृप: परशुरामश्च सप्तएतै चिरजीविन: ॥
सप्तैतान् संस्मरेन्नित्यं मार्कण्डेयमथाष्टमम् ।
जीवेद्वर्षशतं सोपि सर्वव्याधिविवर्जित ।।
इसमें हनुमान, विभीषण, परशुराम ,महाराज बली , मुनी कृपाचार्य ,ऋषि मार्कण्डेय ,ऋषि वेद व्यास के साथ अश्वतथामा भी हैं. आखिर क्यों हिंदू किंवदंतियों में अश्वत्थामा को अब भी जिंदा माना जाता है. मध्य प्रदेश का एक ऐसा शिवालय है, जिसके बारे में माना जाता है कि अश्वत्थामा वहां आते हैं.

महाभारत का शापित योद्धा:
महाभारत के एक शापित योद्धा को आज भी जिंदा माना जाता है. उन्हें लेकर बहुत ढेर सारे रहस्य हैं. उस योद्धा का नाम अश्वत्थामा था. वह महाभारत के युद्ध में मरे नहीं थे बल्कि जिंदा ही जंगलों में लुप्त हो गए थे. चूंकि उन्हें भगवान शंकर से अमरता का वरदान मिला हुआ था, लिहाजा लोग मानते हैं कि ये योद्धा आज भी जीवित है. ये या तो हिमालय में कहीं हो सकता है या फिर देश के घने जंगलों में रह रहा होगा.
Highlights
- अश्वताथामा उस 08 शख्सियतों में एक, जिनके बारे में माना जाता है कि वह अब भी जीवित हैं
- Indian mythology के अनुसार वह गुरु द्रोण और कृपी के पुत्र थे, जन्म के साथ वह माथे पर मणि लेकर पैदा हुए थे उन्हें भगवान शंकर से अमरता का वरदान मिला हुआ था
- कहा जाता है कि श्रीकृष्ण ने ही अश्वत्थामा को चिरकाल तक पृथ्वी पर भटकते रहने का श्राप दिया था ।
भगवान शंकर से वरदान:-
महाभारत युद्ध से पूर्व गुरु द्रोणाचार्य अनेक स्थानों में भ्रमण करते हुए हिमालय (ऋषिकेश) प्हुचे। वहाँ तमसा नदी के तट पर एक दिव्य गुफा में तपेश्वर नामक स्वयंभू शिवलिंग है। यहाँ गुरु द्रोणाचार्य और उनकी पत्नी माता कृपि ने शिव की तपस्या की। इनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने इन्हे पुत्र प्राप्ति का वरदान दिया। कुछ समय पश्चात् माता कृपि ने एक सुन्दर तेजश्वी बाल़क को जन्म दिया।
जन्म ग्रहण करते ही इनके कण्ठ से हिनहिनाने की सी ध्वनि हुई जिससे इनका नाम अश्वत्थामा पड़ा। जन्म से ही अश्वत्थामा के मस्तक में एक अमूल्य मणि विद्यमान थी। जो कि उसे दैत्य, दानव, शस्त्र, व्याधि, देवता, नाग आदि से निर्भय रखती थी। वह मणि अश्वत्थामा को बुढ़ापे, भूख, प्यास और थकान से भी बचाती थी। भगवान शिव से प्राप्त उस शक्तिशाली दिव्य मणि ने अश्वत्थामा को लगभग अजेय और अमर बना दिया था।
क्यो मिला था श्राप:
अश्वत्थामा ने आखिरी दिन रात्रि को छलपूर्वक पांडव शिविर में घुसकर, द्रोपदी के सोते हुए 5 पुत्रों की हत्या कर दी थी. साथ ही पांडवों की बची सेना को भी मार डाला था. उसके बाद अश्वत्थामा गंगा तट पर स्थित महर्षि वेदव्यास के आश्रम में चले गए. सुबह होने पर पांडवों को हत्याकांड के बारे में पता चला तो अश्वत्थामा को दंडित करने के लिए वे उसे ढूंढने लगे. अश्वत्थामा ने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग कर पांडवों का वंश नष्ट करने के लिए पाडंवो की कुल वधु उत्तरा के गर्भ पर प्रहार किया था ।
श्रीकृष्ण का श्राप:
निर्दोष आजन्मे बालक की हत्या जैसे कुकृत्य करने के दण्ड स्वरूप पांडवों ने अश्वत्थामा को पकड़ लिया. व उनके माथे पर जो मणि थी, वो भी ले ली. तब अश्वत्थामा के माथे पर घाव हो गया. श्रीकृष्ण ने अश्वत्थामा के मस्तक के घाव को कभी नहीं भरने व चिरकाल तक पृथ्वी पर भटकते रहने का श्राप दिया था ।अश्वत्थामा ने छल से पांडवों के पुत्रों का वध किया था। उनके इस पाप की सजा भी वह आज तक भुगत रहे हैं।
कहाँ है अश्वत्थामा:
अपने पिता की मृत्यु का बदला लेने के लिए अश्वत्थामा को उनकी एक चूक भारी पड़ी और भगवान कृष्ण ने उन्हें युगों-युगों तक धरती पर भटकने का शाप दे दिया। माना जाता है कि करीब 5 हजार साल से अश्वत्थामा यूं ही धरती पर भटक रहे हैं। उनके ही शाप का नतीजा है कि उन्हें आज भी मध्यप्रदेश के एक किले में देखे जाने का दावा किया जाता है।
कहां है यह किला:
मध्यप्रदेश के बुरहानपुर शहर से करीब 20 किमी दूर असीरगढ़ का किला है। यहां के स्थानीय लोगों का कहना है कि अश्वत्थामा आज भी इस किले में भगवान शिव की पूजा करने आते हैं। यहां के लोग अश्वत्थामा से जुड़ी कई दंत कथाएं भी सुनाते हैं। यहां बताते हैं कि अश्वत्थामा को जिसने भी देखा वह या तो जिंदा नहीं बचा या फिर उसकी मानसिक स्थिति सदैव के लिए खराब हो गई।