Hadi rani : देश प्रेम ऐसा, के अपने हाथो से खुद का सर कर दिया कलम , जानिए राजस्थान की एक वीरांगना रानी के बारे में ।

Hadi rani: भारत वीरता और समर्पण की भूमी है, यहां देश के खातिर कई वीरो ने अपने बलिदान दिए है और आज तक देते आ रहे है लेकिन इन्ही बलिदानो मे से एक बलिदान ऐसी रानी का भी है जिसने अपने देश अपने राज्य के खातिर खुद का सर अपने हाथ से कलम कर उसे तोफे मे भेंट कर दिया । हम बात कर रहे है राजस्थान के मेवाड़ की हाडी रानी के बारे में । मेवाड़ की हाड़ी रानी की वीरगाथा बड़ी रोमांचक है।

Hadi rani ने अपने प्रेम और वीरता की कहानी में अपने सतीत्व का बड़ा प्रतीक प्रस्तुत किया। वे अपने पति और राज्य के लिए खुद को कुर्बान कर दी । इस प्रेम और वीरता की कहानी को भारतीय साहित्य में महत्वपूर्ण माना जाता है।

हाइलाइट्स:-

  • मेवाड़ की हाड़ी रानी की वीरगाथा
  • जिनकी शादी उदयपुर (मेवाड़) के सलुंबर के सरदार राव रतन सिंह चूड़ावत से हुई।
  • Hadi rani ने दी थी खुद की कुर्बानी
  • पति को याद दिलाया राष्ट्र धर्म

Hadi rani जीवन परिचय:-

Hadi rani बूंदी के हाड़ा शासक की बेटी थी। जिनकी शादी उदयपुर (मेवाड़) के सलुंबर के सरदार राव रतन सिंह चूड़ावत से हुई। बाद में इन्हें इतिहास में हाड़ी रानी के नाम से जाना गया। हाड़ी रानी एक ऐसी वीरागंना थी जिन्होंने अपने सतीत्व की रक्षा के लिए अपने पति को उसका फर्ज याद दिलाने के लिए अपना सिर अपने हाथ से ही काटकर पेश कर दिया। ताकि वह अपनी नई-नवेली दुल्हन के मोहपाश में बंधा अपने राष्ट्र धर्म से विमुख ना हो।

राष्ट्र प्रेम से बढकर कुछ भी नही :-

यह उस समय की बात है जब मेवाड़ पर महाराणा राजसिंह (1652 – 1680 ई०) का शासन था। इनके सामन्त सलुम्बर के राव चुण्डावत रतन सिंह थे। जिनसे हाल ही में हाड़ा राजपूत सरदार की बेटी से शादी हुई थी। कथा के अनुसार हाड़ी रानी के विवाह को अभी केवल 7 ही दिन हुए थे, हाथों की मेंहदी भी नहीं छूटी थी कि उनके पति को युद्ध पर जाने का फरमान आ गया। जिसमे महाराणा राजसिंह ने राव चुण्डावत रतन सिंह को दिल्ली से ओरंगजेब के सहायता के लिए आ रही अतिरिक्त सेना को रोकने का निर्देश दिया था। चुण्डावत रतन सिंह के लिए यह सन्देश उनका मित्र शार्दूल सिंह ले कर आया था।

पत्र पढ़कर हाड़ी सरदार का मन व्यथित हो गया। अभी उनके विवाह को सात दिन ही हुए थे और पत्नी से बिछड़ने की घड़ी आ गई थी। कौन जानता था कि युद्ध में क्या होगा। एक राजपूत रणभूमि में अपने शीश का मोह त्याकर उतरता है और जरूरत पड़ने पर सिर कटाने से भी पीछे नहीं हटता।

औरंगजेब की सेना तेजी से आगे बढ़ रही थी इसलिए उन्होंने अपनी सेना को युद्ध की तैयारी का आदेश दे दिया। वह इस सन्देश को लेकर अपनी पत्नी हाड़ी रानी के पास पहुँचे और सारी कहानी सुनाई। रानी को भी यह खबर सुनकर सदमा लगा पर उसने खुद को संभाल लिया और अपने पति को युद्ध में जाने के लिए तैयार किया। उनके लिए विजय की कामना के साथ उन्हें युद्ध के लिए विदाई दी।

सरदार अपनी सेना लेकर चल पड़ा। किन्तु उसके मन में रह रह कर आ रहा था कि कही सचमुच मेरी पत्नी मुझे भूल ना जाएँ? वह मन को समझाता पर उसका ध्यान उधर ही चला जाता। आखिर हाड़ी सरदार से रहा न गया। आधे मार्ग से उन्होंने पत्नी के पास एक संदेश वाहक भेज दिया। पत्र में लिखा था कि प्रिय, में तुमसे अत्यधिक प्रेम करता हूं। पत्र पढकर Hadi rani को भी खुशी हुई, रानी ने उत्तर दिया मैं भी। संदेश वाहक पत्र लेकर लौटा ।

हाडा सरदार ने फिर एक पत्र संदेशवाहक के साथ भिजवाया ,इस बार लिखा कि प्रिय, मुझे मत भूलना। मैं जरूर लौटकर आउंगा। Hadi rani का मन थोड़ा विचलित हुआ किन्तु उन्होंने फिर उत्तर दिया…मैं आखिरी साँस तक इंतजार करूंगी। पत्र पढ़कर हाडा सरदार को खुशी हुई। थोडा सा दूर चलकर हाडा सरदार ने फिर संदेश भेजा और लिखा मुझे तुम्हारी बहुत याद आ रही है। अगर संभव हो तो अपनी कोई प्रिय निशानी भेज देना। उसे ही देखकर मैं अपना मन हल्का कर लिया करुंगा।

पत्र पढ़कर हाड़ी रानी सोच में पड़ गयी। अगर उनका पति इसी तरह मोह से घिरा रहा तो शत्रुओं से कैसे लड़ेंगे। अचानक उनके मन में एक विचार आया। उन्होंने संदेशवाहक को अपना एक पत्र देते हुए कहा, “मैं तुम्हें अपनी अंतिम निशानी दे रही हूं। इसे थाल में सजाकर सुंदर वस्त्र से ढककर मेरे वीर पति के पास पहुंचा देना, किन्तु याद रखना कि उनके सिवा इसे कोई और न देखे।”

हाड़ी रानी के पत्र में लिखा था, “प्रिय, मैं तुम्हें अपनी अंतिम निशानी भेज रही हूं। तुम्हें मेरे मोह के बंधनों से आजाद कर रही हूं। अब बेफ्रिक होकर अपने कर्तव्य का पालन करना। मैं स्वर्ग में तुम्हारी बाट जोहूंगी।” पत्र संदेशवाहक को देकर हाड़ी रानी ने अपनी कमर से तलवार निकाली और एक ही झटके में अपना सिर धड़ से अलग कर दिया।

हाडा सरदार की प्रतिक्रिया :-

“संदेश वाहक की आंखों से आंसू निकल पड़े। हाड़ी रानी के कटे सिर को सुहाग के चूनर से ढककर संदेशवाहक भारी मन से युद्ध भूमि की ओर दौड़ पड़ा। उसको देखकर हाड़ा सरदार ने पूछा, “क्या तुम रानी की निशानी ले आए?” संदेशवाहक ने कांपते हाथों से थाल उसकी ओर बढ़ा दिया।

ज्योहि सरदार ने चुनरी हटाई उसकी आँखे फटी रह गई और आंखों से पत्नी का सिर देखता रह गया। उसके मोह ने उससे उसकी सबसे प्यारी चीज छीन ली थी। अब उसके पास जीने को कोई औचित्य नहीं बचा था। उसने मन ही मन कहा, “प्रिये, मैं भी तुमसे मिलने आ रहा हूं।” हाड़ा सरदार के मोह के सारे बंधन टूट चुके थे।”

कहा जाता है कि ,हाडा सरदार ने रानी के सिर को गले मे माला की तरह पहना था और वह शत्रु पर टूट पड़ा। इतना अप्रतिम शौर्य दिखाया था कि उसकी मिसाल मिलना बड़ा कठिन है। जीवन की आखिरी सांस तक वह लंड़ता रहा। औरंगजेब की सहायक सेना को उसने आगे नहीं ही बढऩे दिया, जब तक मुगल बादशाह मैदान छोड़कर भाग नहीं गया था। इस जीत का श्रेय केवल उसके शौर्य को नहीं, बल्कि Hada rani के उस बलिदान को भी जाता है जो अब तक के इतिहास का सबसे बड़ा बलिदान और अविस्मरणीय है।

Hadi rani ने पति को राष्ट्र धर्म याद दिलाने को दी कुर्बानी:-

राजस्थान के मेवाड़ की Hadi rani की वीरगाथा वाकई लोगों को प्रेरणा देने वाली है और त्याग और बलिदान की भावना को जगाने वाली है। हाड़ी रानी ने अपने पति को जीतने के लिए न सिर्फ प्रेरित किया बल्कि एक ऐसा बलिदान दिया जिसे शायद ही कोई बहादुर से बहादुर व्यक्ति भी करने की जहमत उठाए।

जी हां मेवाड़ की वीरांगना ने एक ऐसा बलिदान दिया जिसे करना तो दूर सोचना भी शायद मुमकिन नहीं है। अपने हाथ से अपने सर का बलिदान।

इस तरह हाड़ी रानी ने त्याग और बलिदान देकर अपनी सतीत्व की रक्षा की। इसके साथ ही वीरांगना Hadi rani ने इतिहास के पन्नों पर अपनी अमिट छाप छोड़ी है। उनके मातृभूमि के त्याग और बलिदान को हमेशा याद किया जाएगा।

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